जागें हैं देर तक हमें कुछ देर सोने दो
थोड़ी सी रात और है सुबह तो होने दो
आधे अधूरे ख़्वाब जो पूरे ना हो सके
वो ख्वाब फिर से नींद में कुछ देर बोने दो
जागें हैं देर तक हमें कुछ देर सोने दो
थोड़ी सी रात और है सुबह तो होने दो
आधे अधूरे ख़्वाब जो पूरे ना हो सके
वो ख्वाब फिर से नींद में कुछ देर बोने दो
वैसे तो मेरी हिंदी कभी अच्छी नहीं रही है। फिर भी, मुझे लग रहा है कि जितना स्चूल में लिख-पढ़ सकती थी अब मैं वो भी भूल रही हूँ। राम प्यारे मिश्रा जी को पता चला तो वो क्या सोचेंगे? वैसे, सोचने का वक्त भी कहॉ हैं उनको? वो अगली बैच को icse में एक प्वाइंट दिलाने कि कोशिश में लगे होंगे
। स्चूल के दिनों में तो हर शनिवार के दिन शुद्ध हिंदी में “क्यों बच्ची, काम बनाई हो?” प्रश्न का समाधान अवश्य देना पड़ता था। टीना और मैं प्रेमचंद कि depressing कहानियाँ पढ़ते थे। बोल्ल्य्वूद गीतों में सुने नए शब्दों का अर्थ मस्तेरजी से पूछते थे (वैसे, हमने ऐसा कभी किया नहीं, पर ब्लोग में लिखने के लिए सब कुछ जायज़ है)
शायद मैं यह कहना चाहती हूँ कि मैं न हिंदी ठीक तरह से सीख पायी ना तेलुगु। हिंदी यह कह के नहीं सीखा कि वो मेरी मत्रिभाश नहीं है। और तेलुगु यह कह कर नहीं सीखा कि मैं पैदा तो बिहार में हुई थी na…
अब तो बस, ऑफिस में एक UP वाले MBA हीरो को लीन मारने के में ही हिंदी का प्रयोंग करती हूँ।
क्योंकि वो अल्ल्हाबाद संगीद समिति की music theory परीक्षाएं भी तो नहीं रहीं जहाँ हम बिना कुछ पढे राग परिचय खोल कर नक़ल के जवाब लिखते थे।
लगता है अब चलचित्र देखने और railway station (उसकी हिंदी क्या है) में बिकने वाले बीस रुपिये के डरावने नोवेल पढ़ कर ही हिंदी सीखनी होगी…
आज के लिए बस इतना ही। नमस्कार।